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महाशिवरात्रि व्रत कथा
अनजाने में की गई शिव पूजा से भी मोक्ष प्रदान करने वाली महाशिवरात्रि की पावन कथा।
गीत / Lyrics
॥ श्री Lord Shiva नमः ॥
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है। इस रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का पावन विवाह हुआ था और इसी दिन भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।
प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक व्याध (शिकारी) था। वह शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक बार वह एक साहूकार का कर्ज न चुका पाने के कारण शिव मठ में दिनभर बंदी रहा, जहां उसने शिव कीर्तन सुना। शाम को उसने साहूकार से वादा किया कि वह कल कर्ज चुका देगा और शिकार की खोज में वन में गया।
वह एक बेल के वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया, जिसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। प्यास और ठंड से कांपते हुए उसने रात भर जागरण किया और अनजाने में बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता रहा। प्रथम पहर में एक गर्भिणी हिरणी आई। उसने शिकारी से कहा कि वह अपने बच्चों को सौंपकर लौट आएगी। शिकारी ने उसे छोड़ दिया। इसी प्रकार दूसरे और तीसरे पहर में भी हिरण आए और शिकारी ने दयावश उन्हें जीवनदान दिया।
चारों पहर बेलपत्र और आंसुओं से अनजाने में शिवलिंग की पूजा हो गई। प्रातः जब पूरा मृग परिवार सत्य का पालन करते हुए शिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ, तो शिकारी का हृदय पिघल गया और उसने धनुष फेंक दिया। भगवान शिव ने प्रकट होकर उसे साक्षात दर्शन दिए और मुक्ति का वरदान दिया।
ॐ ॐ ॐ
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लाभ
समस्त पापों का नाश, अकाल मृत्यु से मुक्ति और साक्षात शिवलोक की प्राप्ति।
विस्तृत सामग्री
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाता है। इस रात्रि में भगवान शिव और माता पार्वती का पावन विवाह हुआ था और इसी दिन भगवान शिव ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।
प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक व्याध (शिकारी) था। वह शिकार करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक बार वह एक साहूकार का कर्ज न चुका पाने के कारण शिव मठ में दिनभर बंदी रहा, जहां उसने शिव कीर्तन सुना। शाम को उसने साहूकार से वादा किया कि वह कल कर्ज चुका देगा और शिकार की खोज में वन में गया।
वह एक बेल के वृक्ष पर चढ़कर बैठ गया, जिसके नीचे एक शिवलिंग स्थापित था। प्यास और ठंड से कांपते हुए उसने रात भर जागरण किया और अनजाने में बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता रहा। प्रथम पहर में एक गर्भिणी हिरणी आई। उसने शिकारी से कहा कि वह अपने बच्चों को सौंपकर लौट आएगी। शिकारी ने उसे छोड़ दिया। इसी प्रकार दूसरे और तीसरे पहर में भी हिरण आए और शिकारी ने दयावश उन्हें जीवनदान दिया।
चारों पहर बेलपत्र और आंसुओं से अनजाने में शिवलिंग की पूजा हो गई। प्रातः जब पूरा मृग परिवार सत्य का पालन करते हुए शिकारी के समक्ष उपस्थित हुआ, तो शिकारी का हृदय पिघल गया और उसने धनुष फेंक दिया। भगवान शिव ने प्रकट होकर उसे साक्षात दर्शन दिए और मुक्ति का वरदान दिया।
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