सीधे सामग्री पर जाएँ
श्री खाटू श्याम जी की अमर कथा
← कथा पर जाएं

श्री खाटू श्याम जी की अमर कथा

हारे के सहारे शीश के दानी वीर बर्बरीक भगवान श्री खाटू श्याम जी की सम्पूर्ण अमर कथा।

गीत / Lyrics

॥ श्री Khatu Shyam Ji नमः ॥
श्री खाटू श्याम जी महाभारत काल के महाबली भीमसेन के पौत्र और घटोत्कच तथा नागकन्या माता अहिलावती (मोर्वी) के पुत्र थे। उनका नाम वीर बर्बरीक था। बर्बरीक ने भगवान शिव और नवदुर्गा की कठोर तपस्या करके तीन अमोघ बाण प्राप्त किए थे, जो पूरे ब्रह्मांड को पल भर में समाप्त कर सकते थे। जब महाभारत का महायुद्ध प्रारंभ हुआ, तो बर्बरीक ने युद्ध देखने की इच्छा जताई। माता मोर्वी ने विदा करते समय वचन लिया कि— 'बेटा! जो पक्ष हार रहा हो, तुम उसी का सहारा बनना (हारे का सहारा)।' बर्बरीक अपने नीले घोड़े पर सवार होकर तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र की ओर चले। भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का वेश धरकर मार्ग में आए और बर्बरीक के बाणों की परीक्षा ली। भगवान ने एक पीपल के वृक्ष के सभी पत्तों को एक ही बाण से छेदने को कहा और एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया। बर्बरीक का बाण सभी पत्तों को छेदता हुआ श्रीकृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि कौरवों को हारता देख बर्बरीक उनकी ओर से लड़ेगा और पांडवों को हारता देख पांडवों की ओर से, जिससे पूरी सृष्टि नष्ट हो जाएगी। अतः ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान में उसका शीश मांग लिया। वीर बर्बरीक ने फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को हंसते-हंसते अपना शीश काटकर प्रभु को समर्पित कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर वरदान दिया— 'कलयुग में तुम मेरे नाम 'श्याम' से पूजे जाओगे। जो भी दीन-दुखी तुम्हारी शरण आएगा, तुम उसके 'हारे का सहारा' बनोगे।' आज राजस्थान के सीकर जिले के खाटू धाम में बाबा श्याम का वह पावन शीश विराजित है।
ॐ ॐ ॐ
इन-आर्टिकल विज्ञापन

लाभ

त्याग, निष्ठा और समर्पण की भावना का उदय तथा श्याम बाबा का साक्षात आशीर्वाद मिलता है।

विस्तृत सामग्री

श्री खाटू श्याम जी महाभारत काल के महाबली भीमसेन के पौत्र और घटोत्कच तथा नागकन्या माता अहिलावती (मोर्वी) के पुत्र थे। उनका नाम वीर बर्बरीक था। बर्बरीक ने भगवान शिव और नवदुर्गा की कठोर तपस्या करके तीन अमोघ बाण प्राप्त किए थे, जो पूरे ब्रह्मांड को पल भर में समाप्त कर सकते थे। जब महाभारत का महायुद्ध प्रारंभ हुआ, तो बर्बरीक ने युद्ध देखने की इच्छा जताई। माता मोर्वी ने विदा करते समय वचन लिया कि— 'बेटा! जो पक्ष हार रहा हो, तुम उसी का सहारा बनना (हारे का सहारा)।' बर्बरीक अपने नीले घोड़े पर सवार होकर तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र की ओर चले। भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का वेश धरकर मार्ग में आए और बर्बरीक के बाणों की परीक्षा ली। भगवान ने एक पीपल के वृक्ष के सभी पत्तों को एक ही बाण से छेदने को कहा और एक पत्ता अपने पैर के नीचे छिपा लिया। बर्बरीक का बाण सभी पत्तों को छेदता हुआ श्रीकृष्ण के पैर के चारों ओर घूमने लगा। श्रीकृष्ण ने विचार किया कि कौरवों को हारता देख बर्बरीक उनकी ओर से लड़ेगा और पांडवों को हारता देख पांडवों की ओर से, जिससे पूरी सृष्टि नष्ट हो जाएगी। अतः ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण ने बर्बरीक से दान में उसका शीश मांग लिया। वीर बर्बरीक ने फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को हंसते-हंसते अपना शीश काटकर प्रभु को समर्पित कर दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर वरदान दिया— 'कलयुग में तुम मेरे नाम 'श्याम' से पूजे जाओगे। जो भी दीन-दुखी तुम्हारी शरण आएगा, तुम उसके 'हारे का सहारा' बनोगे।' आज राजस्थान के सीकर जिले के खाटू धाम में बाबा श्याम का वह पावन शीश विराजित है।
HINDI Pauranik Katha Khatu Shyam Ji 16:30
5 पठित 0 पसंद 0 शेयर

संबंधित सामग्री

Comments (0)

Loading comments...

0/2000