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भोजन मंत्र (ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः)
श्रीमद्भगवद्गीता के चतुर्थ अध्याय का अमर भोजन शुद्धि एवं समर्पण श्लोक।
गीत / Lyrics
॥ श्री Lord Krishna नमः ॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
ॐ ॐ ॐ
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संस्कृत पाठ
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
Transliteration
Brahmaarpanam Brahma Havir Brahmaagnau Brahmanaahutam, Brahmaiva Tena Gantavyam Brahma Karma Samaadhina.
अर्थ
अर्पण ब्रह्म है, हवि (अन्न) ब्रह्म है, ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा ही आहुति दी जा रही है। जो ब्रह्म रूप कर्म में समाहित है, उसे ब्रह्म की ही प्राप्ति होती है।
लाभ
अन्न प्रसाद बन जाता है, जठराग्नि संतुलित रहती है और भोजन से सात्विक ऊर्जा मिलती है।
कैसे जपें
भोजन ग्रहण करने से पूर्व हाथ जोड़कर अन्नदेव को नमन करते हुए पाठ करें।
विस्तृत सामग्री
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥
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